""""क्या हवाएं भी बात करती है""
बैठी थी जब मैं आज तनहाइयों में
तभी हवा के झोंके ने मेरे मन में झांका
धीमी धीमी आवाज में बोली मेरे अंतर्मन से
क्या सोच रही है तू
क्यों तू रहती है इतना परेशान
कुछ बातें मुझसे भी तो कर
तुझ से बतियाने की है चाहत मुझमें
जो तेरी खामोशी को पहचाने क्या कोई है तेरा ऐसा.....???
चल नहीं है तो दो बात मुझसे ही कर लें
हूँ मैं दर्पण तेरी
दर्पण से क्यों है तू छुपती यहां तो सब है सच
आवाज सुन खुद से तो कह
तू बन वही जो तू खुद है क्यों तू आज और कल के द्वंद में खुद को भुला बैठी है
क्यों झूठी मुस्कान में सब को झुठला बैठी है।।
तभी टूटी अचानक मेरी निंद्रा फिर हौठो पर झूठी मुस्कान आई
रोका दिल को और खुद से बोली
क्या हवाएं भी कभी बात करती है।।।।।।।
बैठी थी जब मैं आज तनहाइयों में
तभी हवा के झोंके ने मेरे मन में झांका
धीमी धीमी आवाज में बोली मेरे अंतर्मन से
क्या सोच रही है तू
क्यों तू रहती है इतना परेशान
कुछ बातें मुझसे भी तो कर
तुझ से बतियाने की है चाहत मुझमें
जो तेरी खामोशी को पहचाने क्या कोई है तेरा ऐसा.....???
चल नहीं है तो दो बात मुझसे ही कर लें
हूँ मैं दर्पण तेरी
दर्पण से क्यों है तू छुपती यहां तो सब है सच
आवाज सुन खुद से तो कह
तू बन वही जो तू खुद है क्यों तू आज और कल के द्वंद में खुद को भुला बैठी है
क्यों झूठी मुस्कान में सब को झुठला बैठी है।।
तभी टूटी अचानक मेरी निंद्रा फिर हौठो पर झूठी मुस्कान आई
रोका दिल को और खुद से बोली
क्या हवाएं भी कभी बात करती है।।।।।।।
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